भारत की नई आपराधिक न्याय प्रणाली में लागू हुई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) ने कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण प्रावधान है — धारा 356, जिसके अंतर्गत “Trial in Absentia” अर्थात आरोपी की अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने की व्यवस्था दी गई है। हाल ही में Allahabad High Court ने इस धारा की विस्तृत व्याख्या करते हुए बताया कि किन परिस्थितियों में किसी भगोड़े आरोपी के खिलाफ उसकी गैरमौजूदगी में मुकदमा चलाया जा सकता है और न्यायालय को कौन-कौन सी प्रक्रियाओं का पालन करना होगा।
यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय से ऐसे अनेक मामले लंबित पड़े रहते थे जिनमें आरोपी वर्षों तक फरार रहते थे और मुकदमे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ पाती थी। नई व्यवस्था का उद्देश्य न्याय में अनावश्यक देरी को रोकना तथा पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाना है।
धारा 356 BNSS क्या है?
Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 की धारा 356 न्यायालय को यह अधिकार देती है कि यदि कोई आरोपी जानबूझकर न्यायालय की प्रक्रिया से बचने के लिए फरार हो जाए तथा उसकी गिरफ्तारी की संभावना अत्यंत कम हो, तो न्यायालय उसकी अनुपस्थिति में भी ट्रायल चला सकता है।
पुरानी व्यवस्था में सामान्यतः आरोपी की उपस्थिति को आवश्यक माना जाता था। लेकिन कई मामलों में आरोपी जानबूझकर देश छोड़ देते थे, छिप जाते थे या वर्षों तक गिरफ्तारी से बचते रहते थे। परिणामस्वरूप पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता था और न्यायालयों में मामलों का बोझ बढ़ता जाता था। BNSS की धारा 356 इसी समस्या के समाधान के लिए लाई गई है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण दृष्टिकोण
Allahabad High Court ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि न्यायालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि आरोपी वास्तव में जानबूझकर फरार है और न्यायिक प्रक्रिया से बच रहा है। केवल अनुपस्थित रहने मात्र से धारा 356 लागू नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि:
“यदि कोई आरोपी स्वेच्छा से कानून से भाग रहा है, तो वह अपने उपस्थित होकर सुनवाई में भाग लेने के अधिकार का स्वयं त्याग करता है।”
अर्थात आरोपी अपनी गलती का लाभ लेकर न्याय प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक रोक नहीं सकता।
अनुपस्थिति में ट्रायल चलाने की पूरी प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने चरणबद्ध तरीके से पूरी प्रक्रिया स्पष्ट की है, जिसे अपनाना प्रत्येक न्यायालय के लिए आवश्यक होगा।
1. आरोपी का “Proclaimed Offender” घोषित होना
सबसे पहले आरोपी को विधिक प्रक्रिया के तहत “घोषित अपराधी” (Proclaimed Offender) घोषित किया जाएगा। इसके लिए न्यायालय पहले गिरफ्तारी वारंट जारी करेगा। यदि आरोपी गिरफ्तारी से बचता है और उपस्थित नहीं होता, तब उद्घोषणा (Proclamation) जारी की जाएगी।
यदि उद्घोषणा के बाद भी आरोपी न्यायालय में उपस्थित नहीं होता, तब उसे भगोड़ा या घोषित अपराधी माना जाएगा।
यह प्रक्रिया इसलिए आवश्यक है ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ बिना जानकारी के ट्रायल प्रारंभ न हो जाए।
2. गिरफ्तारी के प्रयास का रिकॉर्ड
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस को यह दिखाना होगा कि आरोपी को गिरफ्तार करने के वास्तविक प्रयास किए गए थे। केवल औपचारिकता पूरी करना पर्याप्त नहीं होगा।
पुलिस को निम्न विवरण प्रस्तुत करने होंगे:
आरोपी के संभावित ठिकानों पर दबिश,
रिश्तेदारों से पूछताछ,
नोटिस तामील,
संपत्ति कुर्की की कार्रवाई,
विदेश भागने की स्थिति में संबंधित एजेंसियों से संपर्क।
यदि न्यायालय को लगे कि आरोपी वास्तव में गिरफ्तारी से बच रहा है, तभी आगे की कार्यवाही होगी।
3. समाचार पत्र में प्रकाशन
न्यायालय आरोपी को अंतिम अवसर देने हेतु समाचार पत्रों में उद्घोषणा प्रकाशित करवा सकता है। इसका उद्देश्य आरोपी को सार्वजनिक रूप से सूचना देना होता है कि यदि वह निर्धारित समय में उपस्थित नहीं होगा तो उसके खिलाफ अनुपस्थिति में मुकदमा चलाया जाएगा।
यह प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।
4. 90 दिन का समय
धारा 356 के अंतर्गत ट्रायल प्रारंभ करने से पहले आरोपी को कम से कम 90 दिन का समय देना आवश्यक है। इस अवधि में आरोपी को अदालत के समक्ष उपस्थित होने का अवसर दिया जाता है।
यदि आरोपी फिर भी उपस्थित नहीं होता, तो माना जाएगा कि वह जानबूझकर मुकदमे से बच रहा है।
5. न्यायालय द्वारा लिखित संतुष्टि
कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश को लिखित रूप से यह दर्ज करना होगा कि:
आरोपी जानबूझकर फरार है,
उसकी गिरफ्तारी की संभावना कम है,
और न्यायहित में ट्रायल आगे बढ़ाना आवश्यक है।
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है ताकि धारा 356 का दुरुपयोग न हो सके।
6. आरोपी के लिए अधिवक्ता की नियुक्ति
भले ही आरोपी उपस्थित न हो, फिर भी उसे निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त रहेगा। इसलिए न्यायालय आरोपी की ओर से अधिवक्ता नियुक्त करेगा।
यदि आरोपी ने स्वयं कोई वकील नियुक्त नहीं किया है, तो राज्य खर्च पर विधिक सहायता (Legal Aid Counsel) उपलब्ध कराई जाएगी।
यह व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की रक्षा करती है।
7. साक्ष्यों की रिकॉर्डिंग
ट्रायल के दौरान:
गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए जाएंगे,
दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत होंगे,
जिरह की प्रक्रिया भी अपनाई जाएगी,
तथा पूरी कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की जा सकती है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में आरोपी गिरफ्तार होने पर पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रूप से उपलब्ध रहे।
8. आरोपी की बाद में गिरफ्तारी होने पर अधिकार
यदि बाद में आरोपी गिरफ्तार हो जाता है या स्वयं अदालत में उपस्थित होता है, तो उसे:
मुकदमे की रिकॉर्डिंग देखने,
दस्तावेज प्राप्त करने,
तथा विधि अनुसार उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने का अधिकार होगा।
हालांकि यह अधिकार सीमित परिस्थितियों में होगा और अदालत के विवेक पर निर्भर करेगा।
अपील का अधिकार
धारा 356 का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अपील से संबंधित है।
यदि आरोपी की अनुपस्थिति में उसे दोषी ठहराया जाता है, तो वह सीधे अपील नहीं कर सकता। पहले उसे न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा।
इसके अतिरिक्त:
निर्णय के तीन वर्ष के भीतर उपस्थित होना आवश्यक हो सकता है,
अन्यथा अपील का अधिकार समाप्त हो सकता है।
यह प्रावधान इसलिए बनाया गया है ताकि आरोपी जानबूझकर फरार रहकर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न कर सके।
धारा 356 का उद्देश्य
इस प्रावधान के पीछे मुख्य उद्देश्य हैं:
1. न्याय में देरी रोकना
कई मामलों में आरोपी वर्षों तक फरार रहते थे जिससे मुकदमे लंबित रहते थे। अब अदालतें ऐसे मामलों में आगे बढ़ सकेंगी।
2. पीड़ितों को राहत
पीड़ित और उनके परिवार लंबे समय तक न्याय की प्रतीक्षा करते थे। यह व्यवस्था उन्हें समय पर न्याय दिलाने में सहायक हो सकती है।
3. न्यायालयों का बोझ कम करना
लंबित मामलों की संख्या कम करने में यह प्रावधान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
4. अपराधियों में भय
अब केवल फरार हो जाने से मुकदमा नहीं रुकेगा, जिससे अपराधियों में कानून का भय बढ़ेगा।
क्या धारा 356 का दुरुपयोग संभव है?
कुछ विधि विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है कि यदि सावधानीपूर्वक उपयोग न किया जाए तो इस प्रावधान का दुरुपयोग भी हो सकता है।
उदाहरण के लिए:
यदि आरोपी को सही जानकारी न मिले,
पुलिस पर्याप्त प्रयास न करे,
या किसी निर्दोष व्यक्ति को गलत तरीके से भगोड़ा घोषित कर दिया जाए।
इसी कारण हाईकोर्ट ने विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं ताकि आरोपी के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रह सकें।
प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत
भारतीय कानून में “Audi Alteram Partem” सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है:
“दूसरे पक्ष को भी सुनो।”
धारा 356 इस सिद्धांत का पूर्ण त्याग नहीं करती। बल्कि यह कहती है कि यदि आरोपी स्वयं सुनवाई से भाग रहा है, तो वह अपने अधिकार का त्याग कर रहा है।
इसलिए अदालत को यह सुनिश्चित करना होगा कि आरोपी को पर्याप्त अवसर दिया गया था।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्था
विश्व के कई देशों में अनुपस्थिति में ट्रायल की व्यवस्था पहले से मौजूद है।
उदाहरण:
फ्रांस,
इटली,
अमेरिका के कुछ राज्यों,
तथा यूनाइटेड किंगडम में सीमित परिस्थितियों में ऐसी व्यवस्था लागू है।
भारत ने भी आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणाली की दिशा में यह कदम उठाया है।
भारतीय न्याय व्यवस्था पर प्रभाव
धारा 356 भविष्य में भारतीय न्याय व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। विशेष रूप से:
गैंगस्टर मामलों,
आर्थिक अपराधों,
संगठित अपराध,
आतंकवाद,
तथा विदेश भाग चुके आरोपियों के मामलों में इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है।
अब केवल फरार होकर मुकदमे से बचना आसान नहीं रहेगा।
निष्कर्ष
Allahabad High Court द्वारा BNSS की धारा 356 पर दिया गया स्पष्टीकरण भारतीय न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि न्याय प्रक्रिया आरोपी की जानबूझकर अनुपस्थिति के कारण अनिश्चितकाल तक नहीं रुक सकती।
हालांकि अदालतों को इस प्रावधान का उपयोग अत्यंत सावधानी और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर करना होगा ताकि किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन न हो।
नई व्यवस्था का मूल उद्देश्य है —
न्याय को प्रभावी बनाना,
पीड़ितों को राहत देना,
तथा फरार अपराधियों को कानून से बचने से रोकना।
यदि इस प्रावधान का संतुलित और निष्पक्ष उपयोग किया गया, तो यह भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक मजबूत और तेज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
Disclaimer
यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी एवं शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी विशेष मामले में कानूनी सलाह हेतु योग्य अधिवक्ता से व्यक्तिगत परामर्श अवश्य लें। कानून समय-समय पर संशोधित हो सकते हैं तथा न्यायालयों के निर्णय परिस्थितियों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।