न्यायालय श्रीमान सिविल जज (सीनियर डिवीजन), लखनऊ
वाद संख्या : 123/2026
राम कुमार बनाम श्याम लाल
धारा 151 सी.पी.सी. के अंतर्गत वाद बहाली (Restoration) हेतु प्रार्थना-पत्र
प्रार्थी/वादी:
राम कुमार पुत्र श्री हरिनारायण निवासी – अलीगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश।
विपक्षी/प्रतिवादी:
श्याम लाल पुत्र श्री मोतीलाल निवासी – गोमतीनगर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश।
प्रार्थना-पत्र
महोदय,
- यह कि उपरोक्त वाद माननीय न्यायालय में विचाराधीन है तथा वादी द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा हेतु प्रस्तुत किया गया था।
- यह कि दिनांक 10.05.2026 को वाद नियत तिथि पर प्रस्तुत था, किन्तु अपरिहार्य कारणोंवश प्रार्थी न्यायालय में उपस्थित नहीं हो सका।
- यह कि प्रार्थी का अधिवक्ता भी अचानक अस्वस्थ हो जाने के कारण न्यायालय में उपस्थित नहीं हो पाया, जिसके कारण माननीय न्यायालय द्वारा वाद को अनुपस्थिति में निरस्त (Dismiss in Default) कर दिया गया।
- यह कि प्रार्थी का न्यायालय में अनुपस्थित रहना जानबूझकर अथवा न्यायिक प्रक्रिया में विलंब करने के उद्देश्य से नहीं था, बल्कि परिस्थितिवश हुआ।
- यह कि प्रार्थी अपने वाद को पूर्ण निष्ठा एवं गंभीरता के साथ आगे बढ़ाना चाहता है तथा न्यायालय के प्रति पूर्ण सम्मान रखता है।
- यह कि यदि वाद को बहाल नहीं किया गया तो प्रार्थी को अपूरणीय क्षति होगी तथा न्याय के सिद्धांतों के विपरीत परिणाम उत्पन्न होंगे।
- यह कि विपक्षी पक्ष को वाद बहाल किए जाने से कोई विशेष क्षति नहीं होगी, जबकि प्रार्थी को न्याय प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हो सकेगा।
- यह कि न्यायहित में एवं उचित न्यायिक प्रक्रिया के पालन हेतु वाद को पुनः अपने मूल नंबर पर बहाल किया जाना अत्यंत आवश्यक है।
प्रार्थना
अतः श्रीमान न्यायालय से विनम्र प्रार्थना है कि प्रार्थी का निरस्त वाद दिनांक 10.05.2026 से पुनः अपने मूल नंबर पर बहाल (Restore) करने की कृपा करें, जिससे न्याय हित सुरक्षित रह सके।
प्रार्थी सदैव न्यायालय का आभारी रहेगा।
स्थान: लखनऊ
दिनांक: //2026
प्रार्थी
राम कुमार
अधिवक्ता
(हस्ताक्षर)
सत्यापन (Verification)
मैं, राम कुमार उपरोक्त प्रार्थी, यह सत्यापित करता हूँ कि इस प्रार्थना-पत्र की विषयवस्तु मेरे व्यक्तिगत ज्ञान एवं विश्वास पर आधारित सत्य एवं सही है।
दिनांक: //2026
स्थान: लखनऊ
प्रार्थी
(हस्ताक्षर)
Disclaimer
यह ड्राफ्ट केवल शैक्षणिक एवं सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी न्यायालय में प्रस्तुत करने से पूर्व तथ्यों एवं आवश्यक विधिक प्रावधानों के अनुसार संशोधन अवश्य कर लें। प्रत्येक वाद की परिस्थितियाँ भिन्न हो सकती हैं।
Author: ADV. DS